मानव मादा जनन तंत्र Human Female Reproductive System

मानव मादा जनन तंत्र Human Female Reproductive System 


मानव में मादा जनन तंत्र में पाँच भाग होते हैं—अंडाशय (Ovary), अंडवाहिनी (Fallopio tube), गर्भाशय (Uterus), योनि (Vagina) तथा भग (Vulva)। इन अंगों का विवरण इस प्रकार है — 

मानव मादा जनन तंत्र 



(1) अंडाशय (Ovary): स्त्री के शरीर में उदर गुहा के ठीक नीचे दो गोलाकार अंडाशय होते हैं जो बायें और दाहिने हिस्से में भलीभाँति व्यवस्थित होते हैं अंडाशय के दो प्रमुख कार्य हैं- 

(i) अंडाणुओं या डिम्बों (Ova) का उत्पादन करना और
(ii) मादा हॉर्मोनों जैसे एस्ट्रोजन और प्रोजेस्ट्रॉन का स्राव करना।

प्रत्येक अंडाशय एकान्तर क्रम में या बारी-बारी एक-एक डिम्ब का उत्पादन करके गर्भाशय में भेजता है। प्रायः 10 से 11 वर्ष की आयु में अंडाशय में डिम्ब एवं मादा जनन हॉर्मोनों का स्राव प्रारंभ हो जाता है। हॉर्मोनों का स्राव प्रारंभ होते ही आन्तरिक एवं बाह्य जनन अंगों का विकास प्रारंभ हो जाता है एवं द्वितीय लैंगिक लक्षण उत्पन्न होने लगते हैं। 
स्तनों(mammary glands) का विकास एवं वृद्धि, भग पर एवं बगलों में बालों का उगना तथा
नितम्बों में फैलाव, द्वितीयक लैंगिक लक्षण कहलाते हैं।

(2) डिम्ब वाहिनी (Oviduct or Fallopian Tube) : प्रत्येक अंडाशय के पास से एक कीप के आकार की रचना प्रारंभ होती है जिसका सम्बन्ध गर्भाशय से होता है। इसे डिम्ब वाहिनी कहते हैं। अंडाशय के निकट डिम्ब वाहिनी अंगुलियों जैसे प्रवर्थों की एक झालर बनाती है जिसे फिम्ब्री (Fimbri) कहते हैं। प्रत्येक 28 दिन के बाद दोनों अंडाशय बारी-बारी अंडाणुओं को उत्पन्न करते हैं जो फिम्ब्री द्वारा पकड़कर डिम्ब वाहिनी में पहुँचा दिये जाते हैं।

डिम्ब वाहिनी मुख्यतः दो कार्य करती है.
(i) अंडाणुओं को गर्भाशय तक पहुँचाना और
(ii) निषेचन में सहायक स्थान उपलब्ध कराना।

(3) गर्भाशय (Uterus): यह एक मांसल त्रिभुजाकार अंग है जो श्रोणिगुहा में स्थित होता है। यह सामान्यतः 7.5 सेमी लम्बा, 5 सेमी चौड़ा और 3.5 सेमी मोटा होता है। इसका चौड़ा भाग ऊपर की ओर होता है जिसके दोनों छोरों पर डिम्ब वाहिनियाँ लगी होती हैं। गर्भाशय का निचला सँकरा भाग गर्भाशय-ग्रीवा कहलाता है जिसके बीचो-बीच एक छोटा छिद्र होता है जिससे होकर केवल शुक्राणु ही गर्भाशय में पहुँच सकते हैं। गर्भाशय के तीन प्रमुख कार्य हैं



(i) ऋतु स्राव चक्र का संचालन
(ii) गर्भधारण करना एवं गर्भ का पोषण करना
(iii) गर्भ का परिवर्धन एवं विकास करना।

(4) योनि (Vagina) : यह एक लम्बी और मांसल नली होती है। इसकी लम्बाई मादा की लम्बाई पर निर्भर होती है। फिर भी इसकी औसत लम्बाई 7.5 सेमी के लगभग होती है।

यह भग से लेकर गर्भाशय ग्रीवा तक फैली होती है। इसकी भीतरी दीवार एपीथीलियम ऊतक की बनी होती है जिसमें छोटी-छोटी ग्रन्थियाँ पायी जाती हैं जो एक प्रकार के चिकने और लसदार पदार्थ का स्राव करती है। 
प्रायः योनि के भीतर एक पतली झिल्ली होती है जिसे हाइमेन (Hymen) कहते हैं। यह झिल्ली कम उम्र की लड़कियों में पायी जाती है जो उछल-कूद या भाग-दौड़ के समय या रजोस्राव प्रारंभ होने पर समाप्त हो जाती है।



योनि चार प्रकार के कार्य करती है (i) यह पुरुष के शिश्न को अन्दर जाने का मार्ग प्रदान करती है।

(ii) शिश्न से स्वखलित वीर्य को गर्भाशय के सम्पर्क में लाती है। (iii) गर्भाशय के स्रावों को बाहर आने का रास्ता देती है।

(iv) गर्भस्थ शिशु को बाहर आने के लिए फैलती है और चौड़ा मार्ग प्रदान करती है।

(5) भग (External Genitalia or Vulva) : योनि बाहर की ओर एक छिद्र द्वारा खुलती है जिसे योनिद्वार कहते हैं। इस छिद्र के ऊपर एक छोटा सा अन्य छिद्र होता है जिसे मूत्रद्वार कहते हैं। इन द्वारों के आस-पास के मांसल भाग को बाह्य जननेन्द्रिय (External Genitalia) या भग कहते हैं। भग के उठे हुए त्रिभुजाकार भाग को प्यूबिस कहते हैं ।


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