मानव नर प्रजनन तंत्र Human Reproductive System
मानव जनन-तंत्र
HUMAN REPRODUCTIVE SYSTEM
उच्च श्रेणी के दूसरे जन्तुओं की तरह मनुष्य में भी लैंगिक जनन नर एवं मादा के जनन अंगों की क्रिया से ही सम्भव होता है। इसे समझने के लिए नर एवं मादा जनन अंगों की बनावट को अलग-अलग समझना जरूरी है।
1 .नर जनन तंत्र (Male Reproductive System)
नर जनन तंत्र के विभिन्न भागों का विवरण निम्नवत है,
(i) वृषण (Testes): मनुष्य के शरीर में एक जोड़ी वृषण पाये जाते हैं जो पेशीय थैली वृषण कोष (Scrotal sac) के अन्दर बन्द रहते हैं। वृषण कोष मुख्य शरीर से बाहर शिश्न के नीचे अवस्थित होता है। वृषण की कोशिकाएँ शुक्राणुओं को उत्पन्न करती हैं।
सामान्यत: शरीर के ताप पर वृषण में शुक्राणुओं का उत्पादन सम्भव नहीं होता क्योंकि शुक्राणुओं के उत्पादन के लिए शरीर के ताप से 2-3°C कम ताप की आवश्यकता होती है। इसीलिए वृषण कोष शरीर के बाहर होता है।
वृषण की कुछ विशेष कोशिकाएँ नर जनन हॉर्मोन टेस्टोस्टेरान (Testosteron) का स्राव करती हैं। नर में इस हॉर्मोन का स्राव प्राय: 15 से 18 वर्ष की उम्र में प्रारंभ हो जाता है।
(ii) अधिवृषण (Epididymis) : यह एक लम्बी और कुंडलित नलिका होती है जो वृषण के पिछले भाग से लगी होती है। इसमें शुक्राणु संचित रहते हैं। अधिवृषण अन्तिम रूप से एक नलिका में रूपान्तरित होता है जिसे शुक्रवाहिका (vas difference) कहते हैं।
(iii) शुक्रवाहिका (Vas difference) : यह मांसल और संकुचनशील दीवारों वाली एक पतली नली होती है जो मूत्राशय के चारों ओर घूमकर अन्तिम रूप से मूत्रमार्ग में खुलती है।
(iv) शुक्राशय (Seminal Vesicle) : यह छोटी-छोटी नलिकाओं से बनी हुई रचना है जो अधिक कुंडलित होती है। यह एक गाढ़े शुक्राशय द्रव (seminal fluid) का स्राव करती जो शुक्राणुओं से मिलने के बाद वीर्य (semen) कहलाता है। वीर्य एक गाढ़ा श्वेत रंग का अर्ध-तरल पदार्थ होता है जिसमें विचित्र प्रकार की गन्ध होती है।
(v) पुरःस्थ (Prostrate) : यह दोहरी पालियों वाली ग्रन्थि होती है जिसकी नलिकाएँ मूत्रमार्ग में खुलती हैं। यह पुरःस्थ द्रव (Prostrate fluid) का स्राव करती है जो एक क्षारीय पदार्थ होता है जो वीर्य से मिलकर पुरुष के मूत्रमार्ग एवं स्त्री की योनि की अम्लीयता को उदासीन कर देता है। इसमें विशेष प्रकार की गन्ध भी होती है।
(vi) काउपर ग्रन्थि (Cowper's gland) : यह ग्रन्थि जोड़े में होती है और पुरःस्थ के ठीक नीचे स्थित होती है। इसका सम्बन्ध एक छोटे रास्ते से होकर मूत्रमार्ग से होता है। यह एक सफेद क्षारीय द्रव का स्राव करती है जो चिकना होने के कारण स्नेहक का कार्य करता है।
(vii) शिश्न (Penis) : यह पुरुष की बाह्य जनन इन्द्रिय है जिसके भीतर मूत्रवाहिनी होती है। शिश्न की मूत्रवाहिनी मूत्र एवं वीर्य को बाहर निकालने का कार्य करती है। शिश्न के भीतरी मूत्रवाहिनी के दोनों ओर स्पांजी ऊतकों की तीन कतारें होती हैं जो रक्त से भर जाने के बाद शिश्न को कठोर बना देती हैं। शिश्न का अग्रभाग एक फूली हुई गोलाकार रचना होती है। इसे ग्लांस (glans) कहते हैं। यह त्वचा के दोहरे स्तरों से ढँकी होती है जिसे प्रीप्यूस कहते हैं।
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